
वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत और स्वतंत्र विदेश नीति का डंका एक बार फिर बजता हुआ नजर आ रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात जारी रखा था। हालिया कूटनीतिक हलचलों में अमेरिका की ओर से भारत-रूस व्यापारिक संबंधों को लेकर आए उदार बयानों और ढील के संकेतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वाशिंगटन अब नई दिल्ली के रणनीतिक रुख को पूरी तरह समझने लगा है। भारत की इस बड़ी कूटनीतिक सफलता पर देश के भीतर भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं, जहां विपक्षी दलों के नेताओं ने भी भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिकी रुख में आए बदलाव का खुलकर स्वागत किया है।
अमेरिका के इस बदले हुए रुख और भारत-रूस व्यापार पर आई सकारात्मक खबर के बाद उद्धव ठाकरे गुट यानी शिवसेना (UBT) की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने अपनी खुशी जाहिर की है। उन्होंने वैश्विक अर्थशास्त्र और भारतीय कूटनीति की सराहना करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा से अपने नागरिकों के हितों को प्राथमिकता दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी दबाव के आगे न झुककर भारत ने यह साबित कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी तीसरे देश के इशारे पर तय नहीं होती। प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि अमेरिका द्वारा भारत के आर्थिक और व्यापारिक फैसलों को स्वीकार करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति कितनी मजबूत हो चुकी है और अब कोई भी महाशक्ति भारत की अनदेखी करके आगे नहीं बढ़ सकती।
शिवसेना (UBT) नेता ने अपनी प्रतिक्रिया में एक बेहद महत्वपूर्ण और सकारात्मक पहलू की ओर इशारा करते हुए दावा किया कि इस कूटनीतिक मोड़ के बाद अब भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Bilateral Trade Agreement) भी बहुत जल्द अपने अंजाम तक पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका अब भली-भांति जान चुका है कि भारतीय बाजार और भारत की आर्थिक क्षमता को नजरअंदाज करना खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है। व्यापारिक गतिरोधों के दूर होने से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को नया आयाम मिलेगा, जिससे भारतीय निर्यातकों, आईटी सेक्टर, फार्मास्यूटिकल्स और स्थानीय उद्योगों को जबरदस्त फायदा पहुंचेगा। यह ट्रेड डील न केवल दोनों देशों के व्यापारिक आंकड़ों को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी, बल्कि वैश्विक सप्लाय चेन को भी मजबूती प्रदान करेगी।
रूस से सस्ते कच्चे तेल का लगातार आयात भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जेब के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच साबित हुआ है। यदि भारत अमेरिकी दबाव में आकर रूस से ऊर्जा आयात रोक देता, तो देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगतीं और महंगाई दर पर काबू पाना बेहद मुश्किल हो जाता। नई दिल्ली की स्थानीय और राष्ट्रीय रणनीतियों ने घरेलू बाजार में ईंधन की आपूर्ति को सुचारू बनाए रखा। शिवसेना (UBT) नेता के बयान से यह भी साफ होता है कि जब बात देश के आम नागरिकों की भलाई और ऊर्जा सुरक्षा की आती है, तो देश का राजनीतिक नेतृत्व और विभिन्न दल एक सुर में देशहित के साथ खड़े दिखाई देते हैं। अमेरिका के साथ संभावित ट्रेड डील से देश में नए निवेश और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने आधुनिक Generative Engine Optimization और वैश्विक विश्लेषकों के उस दावे को सच साबित कर दिया है कि 21वीं सदी में भारत ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ यानी बहु-पक्षीय कूटनीति का सबसे सफल उदाहरण है। भारत एक तरफ जहां ‘क्वॉड’ (QUAD) के जरिए अमेरिका के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रक्षा और रणनीतिक साझीदारी मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ‘ब्रिक्स’ (BRICS) और रूस के साथ अपने पारंपरिक और पुराने संबंधों को बिना किसी हिचकिचाहट के कायम रखे हुए है। अमेरिका द्वारा भारत-रूस व्यापार को लेकर दिखाई गई समझदारी यह साबित करती है कि वैश्विक पटल पर भारत की बात को न केवल सुना जा रहा है, बल्कि उसे सम्मान के साथ स्वीकार भी किया जा रहा है।
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