कल कितने बजे से पहले बांधें राखी? जानिए पूर्णिमा समाप्त होने और प्रतिपदा तिथि शुरू होने का सटीक समय, उदयातिथि के नियम और पूरे दिन के सबसे शुभ मुहूर्त

भाई-बहन के पवित्र प्रेम और अटूट विश्वास का महापर्व रक्षाबंधन इस वर्ष तिथियों की विशेष गणना के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। पंचांग के अनुसार सावन मास की पूर्णिमा तिथि कल सुबह तक ही प्रभावी रहेगी। इसके बाद भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की ‘प्रतिपदा तिथि’ आरंभ हो जाएगी। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सावन पूर्णिमा तिथि कल सुबह 09 बजकर 48 मिनट तक ही रहेगी। 09:48 बजे के उपरांत पूर्णिमा समाप्त होकर प्रतिपदा तिथि लग जाएगी। सनातन धर्म में रक्षाबंधन का मुख्य पर्व पूर्णिमा तिथि में ही मनाने का विधान है। यही कारण है कि धर्मशास्त्रियों और ज्योतिषाचार्यों द्वारा यह विशेष सलाह दी जा रही है कि यदि संभव हो तो सभी बहनें कल सुबह 09:48 बजे से पहले ही अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने का मुख्य अनुष्ठान संपन्न कर लें।

प्रतिपदा तिथि लगने से पहले राखी बांधने का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: अमृत और शुभ चौघड़िया

कल सूर्योदय के साथ ही वातावरण अत्यंत सात्विक और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहेगा। पूर्णिमा तिथि के रहते सुबह के समय राखी बांधना सबसे उत्तम और अमृत फलदायी माना गया है।

  • सर्वश्रेष्ठ प्रातःकालीन मुहूर्त: सुबह 05 बजकर 57 मिनट से लेकर सुबह 09 बजकर 48 मिनट तक का समय सबसे मंगलकारी है।

  • चौघड़िया की शुभता: इस समयावधि में अमृत और शुभ के अत्यंत श्रेष्ठ चौघड़िया मुहूर्त विद्यमान रहेंगे। इस समय भाई को तिलक लगाने और रक्षा सूत्र बांधने से भाई की आयु, आरोग्य, कार्यक्षेत्र में उन्नति और भाग्य में वृद्धि होती है।

  • भद्रा मुक्त काल: इस समय किसी भी प्रकार की भद्रा का साया नहीं रहेगा, जिससे यह समय पूरी तरह निर्दोष और कल्याणकारी है।

क्या प्रतिपदा तिथि लगने के बाद भी बांधी जा सकती है राखी? जानिए उदयातिथि का शास्त्रीय नियम

बहुत से श्रद्धालुओं के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठ रहा है कि जो बहनें या भाई दूर-दराज से यात्रा करके आ रहे हैं और सुबह 09:48 बजे तक नहीं पहुंच पाएंगे, क्या वे प्रतिपदा तिथि लगने के बाद राखी नहीं बांध सकेंगे?

धर्मशास्त्रों (विशेषकर निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु) के अनुसार, सनातन परंपरा में ‘उदयातिथि’ को सर्वोपरि मान्यता दी गई है। उदयातिथि का सिद्धांत कहता है कि सूर्योदय के समय जो तिथि आकाश में उपस्थित होती है, उस तिथि का धार्मिक और आध्यात्मिक प्रभाव पूरे दिन व्याप्त रहता है। चूंकि कल सूर्योदय पूर्णिमा तिथि में ही हो रहा है, इसलिए उदयातिथि के नियम के अनुसार कल का पूरा दिन रक्षाबंधन मनाने के लिए शास्त्र सम्मत और मान्य रहेगा। यदि किसी कारणवश आप सुबह 09:48 बजे से पहले राखी नहीं बांध पाते हैं, तो प्रतिपदा तिथि लग जाने के बावजूद भी दिन के अन्य शुभ चौघड़िया और लग्न मुहूर्तों में रक्षा सूत्र बांधा जा सकता है। इसमें किसी भी प्रकार का दोष या पाप नहीं लगता है।

कल राहुकाल का समय: भूलकर भी इस अवधि में न करें भाई का पूजन

प्रतिपदा तिथि लगने के बाद यदि आप दिन में राखी बांध रहे हैं, तो आपको केवल एक विशेष समय से बचना होगा, जिसे ‘राहुकाल’ कहा जाता है। वैदिक ज्योतिष में राहुकाल को अशुभ और विघ्नकारक समय माना गया है। इस दौरान कोई भी शुभ संकल्प, नया कार्य, तिलक या रक्षाबंधन अनुष्ठान नहीं किया जाता।

कल शुक्रवार के दिन पंचांग के अनुसार राहुकाल का समय सुबह 10 बजकर 30 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 00 मिनट तक रहेगा। बहनों को विशेष ध्यान रखना चाहिए कि सुबह 10:30 से दोपहर 12:00 के बीच राखी बांधने से बचें। राहुकाल समाप्त होते ही पुनः शुभ समय आरंभ हो जाएगा।

दोपहर और शाम के वैकल्पिक शुभ मुहूर्त: अभिजीत और लाभ चौघड़िया

राहुकाल समाप्त होने के बाद दोपहर और शाम के समय रक्षा सूत्र बांधने के लिए निम्नलिखित श्रेष्ठ मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे:

  • सर्वदोषनाशक ‘अभिजीत मुहूर्त’: दोपहर 11 बजकर 58 मिनट से दोपहर 12 बजकर 48 मिनट (अथवा दोपहर 12:30 से 01:15 के बीच) रहेगा। अभिजीत मुहूर्त को भगवान विष्णु का प्रिय मुहूर्त माना जाता है, जिसमें समस्त ग्रह दोष स्वतः शांत हो जाते हैं।

  • अपराह्न (दोपहर) का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 45 मिनट से लेकर दोपहर 03 बजकर 30 मिनट तक लाभ और अमृत चौघड़िया रहेगा।

  • शाम का प्रदोष व गोधूलि वेला मुहूर्त: शाम 05 बजकर 12 मिनट से लेकर शाम 06 बजकर 45 मिनट तक चर और लाभ का सुंदर संयोग रहेगा। सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में रक्षा सूत्र बांधना अत्यंत शुभ माना जाता है।

राखी बांधने की शास्त्रीय विधि और नियमों का पालन

शुभ मुहूर्त में पूजा की ताली सजाएं। थाली में शुद्ध कुमकुम/रोली, पीले अक्षत (अखंडित चावल), चंदन, दीपक, रक्षा सूत्र और ताजी मिठाइयां रखें। साथ ही एक नारियल भी रखें। भाई को हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लकड़ी की चौकी या आसन पर बिठाएं। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके राखी बंधवाना वर्जित होता है।

सबसे पहले भाई के माथे पर रोली और चंदन का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत लगाएं। इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर तीन गांठें लगाते हुए रक्षा सूत्र बांधें। तीन गांठें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दिव्य आशीर्वाद की प्रतीक मानी जाती हैं। इसके पश्चात घी के दीपक से भाई की आरती उतारें ताकि नजर दोष और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो। अंत में भाई को मिठाई खिलाकर मुंह मीठा कराएं और भाई अपनी बहन के चरण स्पर्श कर या आशीर्वाद देकर उसकी आजीवन रक्षा का वचन दे और उपहार भेंट करे।

राखी बांधते समय इस कल्याणकारी रक्षा मंत्र का करें उच्चारण

शास्त्रों में वर्णित है कि जब बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है, तब उसे इस पौराणिक रक्षा मंत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

इस मंत्र का भावार्थ है कि जिस पवित्र रक्षा सूत्र से महाबली दानवराज राजा बलि को धर्म के मार्ग में बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हारी कलाई बांधती हूं। हे रक्षा सूत्र! तुम स्थिर रहना और कभी अपने रक्षा के संकल्प से विचलित मत होना। यह मंत्र भाई को हर संकट से सुरक्षित रखने वाला कवच सिद्ध होता है।

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