वॉशिंगटन/बोस्टन। अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले हजारों भारतीय पेशेवरों और आईटी कंपनियों के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा H-1B वीजा आवेदनों पर थोपी गई 1 लाख डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस को बोस्टन की एक जिला अदालत ने अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति प्रशासन ने इस फीस को लागू करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से आवश्यक मंजूरी नहीं ली थी, जो कि नियमों का उल्लंघन है।
कोर्ट का कड़ा फैसला: ‘बिना मंजूरी के टैक्स लगाना गलत’
बोस्टन में यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज लियो सोरोकिन ने इस नीति पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “अदालत का यह मानना है कि यह नीति कांग्रेस की अनिवार्य मंजूरी के बिना H-1B याचिकाओं पर एक तरह का ‘टैक्स’ लगाती है। भले ही इसे कोई भी नाम दिया जाए, लेकिन भुगतान का सार और इसका उद्देश्य स्पष्ट करता है कि यह एक टैक्स है, जिसे लागू करने का अधिकार प्रशासन के पास नहीं है।”
जज ने 20 अमेरिकी राज्यों के उस समूह की दलीलों से सहमति जताई जिन्होंने इस फीस को चुनौती दी थी। कोर्ट ने माना कि ट्रंप प्रशासन ने अपनी अधिकार सीमा का उल्लंघन किया है और यह शुल्क अमेरिकी कांग्रेस की प्रवासन नीति (Migration Policy) और कर निर्धारण की संवैधानिक शक्ति को हड़पने जैसा है।
क्या था ट्रंप का यह विवादास्पद आदेश?
पिछले वर्ष सितंबर में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत नए H-1B वीजा आवेदनों के लिए प्रति कार्यकर्ता सालाना 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क तय किया गया था।
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तर्क: ट्रंप प्रशासन का दावा था कि इस भारी शुल्क से कंपनियां विदेशी कामगारों के बजाय अमेरिकी नागरिकों को नौकरी देने के लिए प्रोत्साहित होंगी।
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हकीकत: इस आदेश से पूरी दुनिया में कुशल पेशेवरों, विशेषकर भारतीय आईटी सेक्टर में अनिश्चितता और डर का माहौल फैल गया था। क्योंकि यह शुल्क प्रायोजक नियोक्ता (Sponsoring Employer) को देना होता है, जिससे विदेशी प्रतिभाओं को हायर करना कंपनियों के लिए बहुत महंगा हो जाता।
भारतीयों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
H-1B वीजा अमेरिका का सबसे लोकप्रिय कार्य वीजा कार्यक्रम है, जो वहां की कंपनियों को तकनीकी रूप से दक्ष विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करने की अनुमति देता है।
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सबसे बड़े लाभार्थी: H-1B वीजा धारकों में भारतीय पेशेवर (आईटी कर्मचारी, इंजीनियर और डॉक्टर) दुनिया में सबसे बड़ा समूह हैं।
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आर्थिक राहत: $1 लाख की फीस हटने से अब भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका में नौकरी पाना और वहां की कंपनियों के लिए भारतीयों को नियुक्त करना फिर से आसान और किफायती हो जाएगा।
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तेज प्रोसेसिंग: होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026 में 2 लाख से अधिक आवेदकों ने तेज प्रोसेसिंग के लिए इस भारी भरकम फीस का भुगतान किया था, जो अब इस फैसले के बाद सवालों के घेरे में है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ट्रंप प्रशासन द्वारा लगातार वीजा नियमों को सख्त करने की कोशिशें की जा रही हैं। इस कानूनी जीत को वैश्विक प्रतिभाओं और अमेरिकी तकनीकी उद्योग के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।
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