नई दिल्ली | हिंदू धर्म में त्रयोदशी तिथि का विशेष महत्व है, और जब यह तिथि गुरुवार को पड़ती है, तो इसे ‘गुरु प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। आज यानी 14 मई 2026 को वैशाख कृष्ण त्रयोदशी पर गुरु प्रदोष का बेहद शुभ संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ देवताओं के गुरु बृहस्पति की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है। आज उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र रात 10:36 बजे तक रहेगा, जो पूजा-पाठ के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है। गुरु प्रदोष का व्रत शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने, सुख-सौभाग्य में वृद्धि और संतान सुख के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
आज शाम पूजा के लिए मिलेगा सिर्फ 2 घंटे का विशेष समय
शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के समय यानी ‘प्रदोष काल’ में की जाती है। आज वैशाख कृष्ण त्रयोदशी तिथि सुबह 11:20 बजे से शुरू हो चुकी है, जो कल 15 मई की सुबह 08:31 बजे तक रहेगी। पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल) शाम 07:05 बजे से रात 09:09 बजे तक रहेगा। भक्तों को महादेव की आराधना के लिए कुल 2 घंटे 05 मिनट की अवधि मिलेगी। इसके अतिरिक्त, शाम 07:04 से 08:22 तक अमृत काल रहेगा, जो मानसिक शांति और ध्यान लगाने के लिए उत्तम माना गया है।
गुरु प्रदोष व्रत की सबसे सरल और सटीक पूजा विधि
यदि आप आज व्रत रख रहे हैं, तो शाम की पूजा से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। सुबह स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र धारण करना शुभ होता है क्योंकि यह दिन गुरु का भी है। सुबह के समय शिव परिवार के साथ भगवान विष्णु की पूजा करें। शाम को प्रदोष काल शुरू होने से ठीक पहले पुनः स्नान कर साफ वस्त्र पहनें। शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर यानी पंचामृत से अभिषेक करें। महादेव को चंदन का तिलक लगाएं और उन्हें प्रिय बेलपत्र, धतूरा और पीले फूल अर्पित करें। पूजा के अंत में प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण करें और घी के दीपक से शिवजी की आरती उतारें।
किस्मत चमकाने के लिए आज जरूर करें ये विशेष उपाय
गुरु प्रदोष के दिन किए गए कुछ खास उपाय जीवन की कई बाधाओं को दूर कर सकते हैं। अगर आप नौकरी में तरक्की चाहते हैं, तो आज 21 बेलपत्र पर चंदन से ‘श्री राम’ लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करें। आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोग शिव चालीसा के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें। यदि विवाह में देरी हो रही है, तो हल्दी की गांठ और चने की दाल का दान करना फलदायी रहेगा। इसके अलावा, शिवलिंग पर केसर मिश्रित दूध चढ़ाने से बृहस्पति दोष शांत होता है और मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
इन नियमों का पालन करना है बेहद जरूरी
प्रदोष व्रत के कुछ कड़े नियम हैं जिनका पालन अनिवार्य माना गया है। पूजा के समय अपना मुख हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें। व्रत के दौरान पूरे दिन निराहार रहने का विधान है, हालांकि स्वास्थ्य ठीक न होने पर फलाहार लिया जा सकता है। इस दिन नमक, मिर्च, अन्न और तामसिक भोजन जैसे प्याज-लहसुन का सेवन वर्जित है। व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद ही करना चाहिए। शांत मन से की गई आराधना ही शिवजी को प्रिय होती है।
क्यों खास है गुरु प्रदोष का महत्व?
शिव पुराण में वर्णित है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। इस समय की गई प्रार्थना सीधे महादेव तक पहुंचती है। गुरु प्रदोष का व्रत करने से कुंडली में बृहस्पति की स्थिति मजबूत होती है, जिससे यश, कीर्ति और उच्च पद की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक शांति देता है बल्कि जातक के जीवन से दरिद्रता का नाश भी करता है।
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