रियाद/तेहरान: मिडिल ईस्ट की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने दुनिया के तमाम सैन्य विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। दशकों तक ‘कोल्ड वॉर’ लड़ने वाले सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव अब सीधे सैन्य टकराव में बदल चुका है। मार्च के अंत में सऊदी वायु सेना ने ईरान की सीमा के भीतर घुसकर कई अघोषित और गुप्त हवाई हमले (Secret Airstrikes) किए। यह आधुनिक इतिहास में पहली बार है जब सऊदी अरब ने अपनी ‘रक्षात्मक’ छवि को त्याग कर सीधे ईरानी धरती पर बमबारी की है।
‘जैसे को तैसा’: क्यों मजबूर हुआ सऊदी अरब?
रॉयटर्स की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब की यह कार्रवाई ईरान की ओर से लगातार हो रहे उकसावे का जवाब थी। मार्च के आखिरी हफ्ते में सऊदी अरब पर 105 से अधिक ड्रोन और मिसाइल हमले हुए थे। इन हमलों ने रियाद को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया। पश्चिमी अधिकारियों ने इसे “जैसे को तैसा” (Eye for an Eye) की नीति करार दिया है। हालांकि, सऊदी अरब ने अभी तक उन विशिष्ट ठिकानों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं जिन्हें निशाना बनाया गया, लेकिन यह साफ है कि हमला ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह सटीक था।
हमले से पहले दी गई थी चेतावनी: कूटनीति और बारूद का खेल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि सऊदी अरब ने इन हमलों को अंजाम देने से पहले कूटनीतिक चैनलों के जरिए ईरान को आगाह कर दिया था।
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19 मार्च: सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सैन्य कार्रवाई का अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही।
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22 मार्च: रियाद ने ईरानी दूतावास के कर्मचारियों को ‘अवांछित’ घोषित कर बाहर निकाला।
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मार्च अंत: सऊदी जेट्स ने ईरानी आसमान में दाखिल होकर मिशन को अंजाम दिया।
अधिकारियों के मुताबिक, इस जवाबी कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने के लिए एक अनौपचारिक सहमति बनी, ताकि इस संघर्ष को ‘पूर्ण युद्ध’ में बदलने से रोका जा सके।
अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर सऊदी एक्शन का असर
सऊदी अरब की इस आक्रामकता का असर व्यापक स्तर पर देखने को मिला। कूटनीतिक दबाव और सैन्य प्रहार के बाद 1 से 6 अप्रैल के बीच सऊदी पर होने वाले हमले 105 से घटकर मात्र 25 रह गए। इसके ठीक एक हफ्ते बाद, 7 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच एक व्यापक युद्धविराम लागू हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब के इन गुप्त हमलों ने ईरान को वार्ता की मेज पर आने और अपने सहयोगियों (प्रॉक्सी समूहों) को नियंत्रित करने के लिए मजबूर किया।
पाकिस्तान और यूएई (UAE) की भी एंट्री
इस युद्ध में सिर्फ सऊदी अरब ही अकेला नहीं है। ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी ईरान पर गुप्त हमले किए हैं। वहीं, अप्रैल की शुरुआत में जब तनाव चरम पर था, तब पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपने लड़ाकू विमान तैनात किए थे। यह दर्शाता है कि ईरान के खिलाफ अब खाड़ी देशों और उनके सहयोगियों का एक मजबूत मोर्चा तैयार हो चुका है।
इराकी जमीन से अभी भी खतरा बरकरार
भले ही ईरान ने सीधे तौर पर हमले कम कर दिए हों, लेकिन इराक की धरती से अभी भी सऊदी अरब पर मिसाइलें दागी जा रही हैं। 12 अप्रैल को सऊदी अरब ने इराक के राजदूत को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया। यह इस बात का संकेत है कि भले ही तेहरान और रियाद के बीच ‘बैकडोर डिप्लोमेसी’ चल रही हो, लेकिन प्रॉक्सी समूहों का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है।
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